सोमवार, 15 अगस्त 2016

तुझे कुछ और भी दूँ... - रामावतार त्यागी

कविता का अंश... मन समर्पित तन समर्पित और यह जीवन समर्पित चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ देश तुझको देखकर यह बोध पाया और मेरे बोध की कोई वजह है स्वर्ग केवल देवताओं का नहीं है दानवों की भी यहाँ अपनी जगह है स्वप्न अर्पित प्रश्न अर्पित आयु का क्षण क्षण समर्पित चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ रंग इतने रूप इतने यह विविधता यह असंभव एक या दो तूलियों से लग रहा है देश ने तुझको पुकारा मन बरौनी और बीसों उँगलियों से मान अर्पित गान अर्पित रक्त का कण कण समर्पित चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ इस अधूरी कविता को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Labels