शनिवार, 18 जनवरी 2014

‘आप’ तो ऐसे न थे

डॉ. महेश परिमल
कहा गया है कि जो जितनी तेजी से ऊपर चढ़ता है, वह उससे भी तेजी से फिसलता भी है। ‘आप’  के साथ ऐसा ही हो रहा है। इस पार्टी ने जितनी तेजी से लोकप्रियता पाई, उससे दोगुनी तेजी से अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है। लोगों ने काफी उम्मीदें लगा रखी थी, इस नए-नवेले दल से। पर उनकी उम्मीदें टूटने लगी हैं। ‘आप’  में इन दिनों जो कुछ हो रहा है, उससे यही लगता है कि आगामी 6 महीनों में यह पार्टी टूटकर बुरी तरह से बिखर जाएगी। रोज-रोज नए-नए नाटक इस पार्टी में होने लगे हैं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर तानाशाही का आरोप लगाया जा रहा है, वह भी उन्हीं के एक विधायक द्वारा। यह सोचने की बात है। दूसरी ओर इस पार्टी का एक और मुखौटा उतरने लगा है, जिसमें यह कहा गया था कि आगामी लोकसभा चुनावों में जो प्रत्याशी होंगे, उसके लिए पहले जनता से पूछा जाएगा। जनाधार वाले नेताओं को ही ‘आप’ का टिकट दिया जाएगा। लेकिन कुमार विश्वास अमेठी से चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है, संजय सिंह, गोपाल राय जैसे नेता जिस तरह से विशिष्ट संसदीय क्षेत्रों में सक्रिय हो गए हैं, उससे यही लगता है कि यह पार्टी जो कहती है, वैसा कर नहीं पा रही है। लगातार एक के बाद एक झूठ सामने आ रहा है। दल की अंदरूनी लड़ाई अब सड़कों पर आ गई है। इससे ‘आप’ से जुड़ी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने कहा है कि पिछले 20 दिनों में उन्होंने जिस तरह से ‘आप’ को देखा, उससे उनका मोहभंग हो गया है। यह शुरुआत है। अभी कई और मोहभंग होने बाकी हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने बंगले के बारे में झूठ बोला। फिर वे अपने ही लोगों को इस बात के लिए राजी नहीं कर पाए कि वे जो कुछ भी बोलें, संभलकर बोलें। एक तरफ उनके वरिष्ठ नेता प्रशांत भूषण कश्मीर पर कुछ भी बोलते रहते हैं। बाद में यह कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है कि ये उनके निजी विचार हैं। पार्टी से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यदि इस तरह से हर कोई अपना विचार मीडिया के सामने प्रकट करे, तो फिर वह कैसे उनका निजी विचार हो जाएगा? दिल्ली विधानसभा की लक्ष्मीनगर सीट से निर्वाचित विनोद कुमार बिन्नी ने जिस तरह से मुख्यमंत्री पर तानाशाह होने का आरोप लगाया है, इसके लिए जो तर्क दिए गए हैं, वह दमदार है। इस पर बिन्नी पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाया गया है। यदि बिन्नी भाजपा की भाषा बोल रहे हैं, तो फिर यह भी तय करना होगा कि मुख्यमंत्री किसकी भाषा बोल रहे हैं। राजनीतिक अनुभवहीनता और बड़बोलेपन के कारण अरविंद केजरीवाल अपने ही बयानों से लगातार विवादास्पद होते जा रहे हैं। अब उनके निशाने पर दिल्ली पुलिस है। उनकी दृष्टि में हर कोई नकारा है, तो फिर सही कौन है, इसे वे भी नहीं जानते। यही हाल रहा, तो लोकसभा चुनाव का रास्ता ‘आप’ के लिए बारुदी सुरंग से भरा होगा। जब तक यह पार्टी वैचारित दृष्टि से पुख्ता नहीं होगी, तब तक ऐसे हालात सामने आते ही रहेंगे।
इस समय ‘आप’ विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रही है। देशभर में सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है। पूरे देश में आम आदमी पार्टी की ही चर्चा है। लोग इसमें शामिल होने के लिए लालायित हैं। गुजरात में मल्लिका साराभाई का इस पार्टी से जुड़ना भी एक घटना है। नर्मदा बचाओ अभियान से अपनी साफ छवि बनाने वाली मेघा पाटकर भी इससे जुड़ने को बेताब है। बिहार में लालू मंत्रिमंडल से भ्रष्टाचार के आरोप में हटाए गए हंसराज नाइन ने भी इस दल से जुड़ने की घोषणा की है। इस तरह से ये सभी एक उद्देश्य के साथ इस दल से जुड़ रहे हैं। इन लोगों में राजनीति में व्याप्त कुरीतियों को हटाने का जज्बा है। नए राजनीतिक समीकरण गढ़ने का माद्दा है। सभी ने एक नया इतिहास बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है, तो केवल ‘आप’ के ही भरोसा। पर अब यह भरोसा टूटता जा रहा है। आम आदमी पार्टी के मुख्यालय में तोड़फोड़ हो, केजरीवाल सरकार के कानून मंत्री ने भ्रष्टाचार किया है या नहीं, बिन्नी-टीना शर्मा जैसे लोग खुलेआम पार्टी पर आरोप लगाते रहे, प्रशांत भूषण के बयानों को सीधे अरविंद केजरीवाल से जोड़ दिया जाए, केजरीवाल के पूर्वज मुस्लिम होने की अफवाह सामने आने लगे, इन सब बातों से यही लगता है कि केजरीवाल में दम तो है, पर वे जो करना चाहते हैं, कर नहीं पा रहे हैं। उन्हें अपनों का ही सहयोग नहीं मिल पा रहा है। उन पर चारों तरफ से हमले हो रहे हैं। इसके बाद भी उनके प्रति लोगों में सहानुभूति नहीं है।
आज यह कहा जा रहा है कि केजरीवाल राजनीति में नए हैं। पर वे पिछले सात साल से राजनीति को देख तो रहे ही हैं, परख रहे हैं। ‘आप’  का गठन करते वक्त उन्होंने यह विश्वास दिलाया था कि उनकी पार्टी का ढांचा लोकतांत्रिक और पारदर्शी होगा। पार्टी सादगी का प्रतिरूप होगी। पर ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। उनके सारे वादे हवा में ही रह गए। अब तो यही कहा जा रहा है कि वे नई राजनीतिक व्यवस्था देने के पहले अपना ही घर देख लें। पहले खुद के घर को व्यवस्थित कर लें, फिर नई राजनैतिक व्यवस्था देने की बात करें। ‘आप’  से लोगों को बड़ी उम्मीदें हैं, उसे इतनी जल्दी टूटने नहीं देना चाहिए। यदि ऐसा होता है, तो भविष्य में कोई भी सकारात्मक राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन खड़ा नहीं हो पाएगा। जनता के किस विश्वास से ‘आप’  को इतना सबल बनाया कि वह सत्ता पर काबिज हो सके। आज यदि ‘आप’  सत्ता पर काबिज हो गई है, तो अपनी अंदरुनी लड़ाई को ही नहीं थाम पा रही है। इससे अवसरवादी राजनीति को बल मिलता है। इसलिए यदि ‘आप’ से उम्मीदें हैं, तो उसे पूरी करना उसकी जवाबदारी है, अन्यथा लोग तो यही कहेंगे कि ‘आप’ तो ऐसे न थे।
 डॉ. महेश परिमल

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