बुधवार, 15 नवंबर 2017

सोमवार, 6 नवंबर 2017

केवल 200 रुपए!

भुलाए नहीं भूलता, वह वाक्या
एक दौर था... जब जावेद अख़्तर के दिन मुश्किल से गुज़रने लगे। ऐसे में उन्होंने साहिर से मदद लेने का फैसला किया। फोन किया और वक्त लेकर उनसे मुलाकात के लिए पहुँचे।
उस दिन साहिर ने जावेद के चेहरे पर उदासी देखी और कहा, “आओ नौजवान, क्या हाल हैं, उदास हो?” 
जावेद ने बताया कि दिन मुश्किल चल रहे हैं, पैसे खत्म होने वाले हैं...
उन्होंने साहिर से कहा कि अगर वो उन्हें कहीं काम दिला दें तो बहुत एहसान होगा।

जावेद अख़्तर बताते हैं कि साहिर साहब की एक अजीब आदत थी, वो जब परेशान होते थे तो पैंट की पिछली जेब से छोटी सी कंघी निकालकर बालों पर फिराने लगते थे। जब मन में कुछ उलझा होता था तो बाल सुलझाने लगते थे। उस वक्त भी उन्होंने वही किया। कुछ देर तक सोचते रहे फिर अपने उसी जाने-पहचाने अंदाज़ में बोले, “ज़रूर नौजवान, फ़कीर देखेगा क्या कर सकता है” फिर पास रखी मेज़ की तरफ इशारा करके कहा, “हमने भी बुरे दिन देखें हैं नौजवान, फिलहाल ये ले लो, देखते हैं क्या हो सकता है”, जावेद अख्तर ने देखा तो मेज़ पर दो सौ रुपए रखे हुए थे।
वो चाहते तो पैसे मेरे हाथ पर भी रख सकते थे, लेकिन ये उस आदमी की सेंसिटिविटी थी कि उसे लगा कि कहीं मुझे बुरा न लग जाए। ये उस शख्स का मयार था कि पैसे देते वक्त भी वो मुझसे नज़र नहीं मिला रहा था।
साहिर के साथ अब उनका उठना बैठना बढ़ गया था क्योंकि त्रिशूल, दीवार और काला पत्थर जैसी फिल्मों में कहानी सलीम-जावेद की थी तो गाने साहिर साहब के। 
अक्सर वो लोग साथ बैठते और कहानी, गाने, डायलॉग्स वगैरह पर चर्चा करते। इस दौरान जावेद अक्सर शरारत में साहिर से कहते, “साहिर साहब, आपके वो दौ सौ रुपए मेरे पास हैं, दे भी सकता हूँ लेकिन दूँगा नहीं” साहिर मुस्कुराते। साथ बैठे लोग जब उनसे पूछते कि कौन से दो सौ रुपए तो साहिर कहते, “इन्हीं से पूछिए”, ये सिलसिला लंबा चलता रहा। साहिर और जावेद अख़्तर की मुलाकातें होती रहीं, अदबी महफिलें होती रहीं, वक्त गुज़रता रहा।
और फिर एक लंबे अर्से के बाद तारीख आई 25अक्टूबर 1980 की। वो देर शाम का वक्त था, जब जावेद साहब के पास साहिर के फैमिली डॉक्टर, डॉ कपूर का कॉल आया। उनकी आवाज़ में हड़बड़ाहट और दर्द दोनों था। उन्होंने बताया कि साहिर लुधियानवी नहीं रहे। हार्ट अटैक हुआ था। जावेद अख़्तर के लिए ये सुनना आसान नहीं था।  वो जितनी जल्दी हो सकता था, उनके घर पहुँचे तो देखा कि उर्दू शायरी का सबसे करिश्माई सितारा एक सफेद चादर में लिपटा हुआ था। वो बताते हैं कि वहाँ उनकी दोनों बहनों के अलावा बी आर चोपड़ा समेत फिल्म इंडस्ट्री के भी तमाम लोग मौजूद थे।
मैं उनके करीब गया तो मेरे हाथ काँप रहे थे, मैंने चादर हटाई तो उनके दोनों हाथ उनके सीने पर रखे हुए थे, मेरी आँखों के सामने वो वक्त घूमने लगा जब मैं शुरुआती दिनों में उनसे मुलाकात करता था, मैंने उनकी हथेलियों को छुआ और महसूस किया कि ये वही हाथ हैं जिनसे इतने खूबसूरत गीत लिखे गए हैं लेकिन अब वो ठंडे पड़ चुके थे। जूहू कब्रिस्तान में साहिर को दफनाने का इंतज़ाम किया गया। वो सुबह-सुबह का वक्त था, रात भर के इंतज़ार के बाद साहिर को सुबह सुपर्दे ख़ाक किया जाना था। ये वही कब्रिस्तान है जिसमें मोहम्मद रफी, मजरूह सुल्तानपुरी, मधुबाला और तलत महमूद की कब्रें हैं।  साहिर को पूरे मुस्लिम रस्म-ओ -रवायत के साथ दफ्न किया गया। साथ आए तमाम लोग कुछ देर के बाद वापस लौट गए लेकिन जावेद अख़्तर काफी देर तक कब्र के पास ही बैठे रहे।
काफी देर तक बैठने के बाद जावेद अख़्तर उठे और नम आँखों से वापस जाने लगे। वो जूहू कब्रिस्तान से बाहर निकले और सामने खड़ी अपनी कार में बैठने ही वाले थे कि उन्हें किसी ने आवाज़ दी। जावेद अख्तर ने पलट कर देखा तो साहिर साहब के एक दोस्त अशफाक साहब थे। अशफाक उस वक्त की एक बेहतरीन राइटर वाहिदा तबस्सुम के शौहर थे, जिन्हें साहिर से काफी लगाव था। अशफ़ाक हड़बड़ाए हुए चले आ रहे थे, उन्होंने नाइट सूट पहन रखा था, शायद उन्हें सुबह-सुबह ही ख़बर मिली थी और वो वैसे ही घर से निकल आए थे। उन्होंने आते ही जावेद साहब से कहा, “आपके पास कुछ पैसे पड़ें हैं क्या? वो कब्र बनाने वाले को देने हैं, मैं तो जल्दबाज़ी में ऐसे ही आ गया”, जावेद साहब ने अपना बटुआ निकालते हुआ पूछा, “हाँ-हाँ, कितने रुपए देने हैं’ उन्होंने कहा, “दो सौ रुपए"

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शनिवार, 4 नवंबर 2017

एकांत का संगीत

clipआज जनसत्ता के संपादकीय पेज पर प्रकाशित आलेख

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017



18 अक्टूबर 2017 को दैनिक लोकोत्तर में प्रकाशित आलेख

बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

सोच बदलने की जरूरत

आज हरिभूमि में प्रकाशित आलेख


दैनिक लोकोत्तर में 17 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित आलेख

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

सोमवार, 25 सितंबर 2017

ममता ने दिया मौका भाजपा को









भोपाल से प्रकाशित इंडिपेंडेंटमेल में 24 सितम्बर 2017 को प्रकाशित आलेख
http://epaper.independentmail.in//index.php?mod=1&pgnum=6&edcode=71&pagedate=2017-9-24&type=a http://epaper.independentmail.in//index.php?mod=1&pgnum=6&edcode=71&pagedate=2017-9-24&type=a




गुरुवार, 31 अगस्त 2017

धर्म और सियासी गठजोड़ के खतरे

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित आलेख 

लोकोत्तर में प्रकाशित आलेख  





मंगलवार, 8 अगस्त 2017

अबु दुजाना के बाद अब बारी जाकिर मूसा की


 डॉ. महेश परिमल

सुरक्षा बलों द्वारा आतंकी अबु दुजाना मारा गया। कश्मीर घाटी में जाकिर मूसा के बाद अबु दुजाना ही खूंखार आतंकी था। यह बरसों तक लश्करे तोएबा के कमांडर के रूप में काम करता था। हाल ही में उसने जाकिर मूसा से हाथ मिलाकर अल-कायदा की भारतीय शाखा के रूप में काम करना शुरू किया था। इसे अंसार गजवट अल हिंद के नाम से भी जाना जाता है। जाकिर मूसा पहले हिजबुल मुजाहिदीन का कमांडर था। पर उससे अलग होकर उसने कश्मीर में इस्लामिक स्टेट की स्थापना के लिए जंग लड़ना शुरू किया था। जाकिर मूसा के गुट में हिजबुल मुजाहिदीन और लश्करे तोएबा के करीब एक दर्जन आतंकी शामिल हुए हैं। अबु दुजाना के मारे जाने से जाकिर के गुट को भारी झटका लगा है। अब जाकिर मूसा अपनी जान बचाने में लगा है।
जाकिर मूसा के पिता अब्दुल राशिद बट जम्मू-कश्मीर सरकार में एक्जिक्यूटिव इंजीनियर के रूप में नौकरी करते हैं। जाकिर मूसा का जन्म 1994 में कश्मीर के पुलवामा जिले के पूरपोरा गांव में हुआ था। जाकिर के पिता उसे अपनी तरह इंजीनियर बनाना चाहते थे। इसके लिए उसे चंडीगढ़ की कॉलेज भेजा। सन् 2013 में जाकिर मूसा छुट्टियों में अपने गांव आया, तब उसकी भेंट हिजबुल मुजाहिदीन के कुछ आतंकियों से हुई। जाकिर उनके विचारों से इतना अधिक प्रभावित हुआ कि पढ़ाई छोड़कर हाथ में बंदूक थाम ली। हिजबुल का कमांडर बुरहान वानी सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ में मारा गया। इसके बाद 22 वर्षीय मूसा को कमांडर बनाया गया। लोग उसे महमूद गजनवी के उपनाम से पुकारते।
दो महीने पहले ही जाकिर मूसा ने वीडियो से यह संदेश दिया था कि कश्मीर की आजादी की जंग को धर्मनिरपेक्ष मानने वाले का कत्ल कर दिया जाएगा। इसके बाद उसने हिजबुल का साथ छोड़ दिया। गुप्तचर संस्था के अनुसार पाकिस्तान में रहने वाले इस्लामिक स्टेट के जो आतंकी कश्मीर में विद्रोह करना चाहते हैं, उनका भरपूर सहयोग जाकिर मूसा को मिल रहा है। कश्मीर में हिजबुल और जाकिर मूसा के समर्थकों के बीच जंग छिड़ जाए, इसकी भी पूरी संभावना है। हाल ही में बुरहान वानी का वारिस बना हिजबुल का कमांडर सब्जार बट सुरक्षा बलों के साथ एनकाउंटर में मारा गया, उसकी टिप भी जाकिर मूसा के किसी साथी ने दी थी, ऐसा माना जा रहा है। कश्मीर के युवाओं में इस्लामिक आतंकवाद का प्रचार करने के लिए जाकिर मूसा सोशल मीडिया का व्यापक उपयोग कर रहा है। जाकिर मूसा समय-समय पर आडियो-वीडियो के माध्यम से संदेश देता रहता है। इससे वह कश्मीर के युवाओं को जेहाद के लिए प्रेरित करता रहता है। कश्मीर में वहाबी संप्रदाय द्वारा चलाई जाने वाली मस्जिदों और मदरसों में भी जुनूनी इस्लाम का उपदेश दिया जाता है। मस्जिदों-मदरसों को चलाने के लिए धन की व्यवस्था सऊदी अरब से होती है। हाल ही में जाकिर मूसा ने उत्तर प्रदेश के बिजनौर में मुस्लिम महिला से हुए कथित गेंगरेप का बनावटी वीडियो जारी किया था, जिसमें भारत के मुस्लिमों को बिना रीढ़ की हड्डी वाला बताया गया था। दूसरे वीडियो में मुस्लिमों को सताने वाले गोरक्षकों को कत्ल करने की नसीहत दी गई।
जाकिर मूसा किसी मदरसे में जाकर कुरान का भी उल्टा-सीधा अध्ययन कर आया है। अपने आतंकी कारनामों को वह वाजिब ठहराता है। वह बार-बार इस्लाम के पवित्र ग्रंथों का हवाला देता है। जाकिर मूसा ने एक वीडियो में कहता है कि पैगम्बर साहब ने कहा है कि जो हिंदुस्तान पर फतह प्राप्त करेगा, उसे जन्नत मिलेगी। जाकिर मूसा ने हिजबुल मे साथ नाता तोड़ने के बाद उसने हिजबुल के 10 से 15 आतंकियों को अपने गुट में शामिल कर लिया था। इसमें से अधिकांश आतंकी कश्मीर के त्राल इलाके के हैं। यही इलाका है, जिसे आतंकी पैदा करने के लिए कुख्यात माना जाता है। जाकिर के बढ़ते प्रभाव से पाकिस्तान में रहने वाला हिजबुल मुजाहिदीन का प्रमुख सैयद सलाउद्दीन भी बहुत चिंतित है। उसने अपने साथियों से कह दिया है कि जाकिर मूसा को न छोड़ें, उसे देखते ही मार डालें। उधर पाकिस्तान की जासूसी संस्था आईएसआई भी उसके बढ़ते प्रभाव से व्याकुल है। क्योंकि जाकिर उसके इशारे पर नाचने को कतई तैयार नहीं है। जाकिर पर सीरिया के इस्लामिक स्टेट का वरदहस्त है। बुरहान वानी के स्थान पर आने वाले जाकिर मूसा ने हिजबुल से नाता तोड़ा, तो उसके बाद सब्जार बट को कश्मीर में हिजबुल का नया कमांडर घोषित किया गया। जाकिर मूसा के इशारे में ही सब्जार को मारा गया। अब उसके स्थान पर 29 वर्षीय रियाज नाईक को हिजबुल का नया कमांडर बनाया गया है। यह भी कंप्यूटर का जानकार है, इसलिए सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं में लोकप्रिय होगा, इसमें कोई दो मत नहीं। कश्मीर घाटी में हिजबुल मुजाहिदीन और जाकिर मूसा के समर्थकों के बीच जंग होती ही रहेगी। इन हालात में भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा कश्मीर में सक्रिय करीब 250 आतंकियों की हिट लिस्ट तैयार कर उसमें से एक के बाद एक को मारा जा रहा है।
केंद्र सरकार ने कश्मीर में सैनिकों को पूरी स्वतंत्रता दे रखी है। सुरक्षा बलों की योजना ठंड शुरू होने के पहले कश्मीर घाटी से तमाम आतंकियों को मार गिराने की है। जबर्दस्त आक्रमण के कारण आक्रामक बने आतंकी एक बार फिर अमरनाथ जैसी घटना की पुनरावृत्ति करें, इसमें कोई दो मत नहीँ। सुरक्षा बलों का कसता शिकंजा आतंकियों के लिए काल बन गया है। ऐसे में जाकिर मूसा भी कभी भी सुरक्षा बलों की गोली का शिकार हो सकता है। आतंक के आका अब खुद आतंक में जी रहे हैं, ऐसे में जल्दबाजी में वे कोई गलती कर सकते हैं। संभव है यही गलती उनके लिए काल बन जाए। इसलिए भारतीय सुरक्षा बलों को इस बात का खयाल रखना होगा कि बिफरे हुए आतंकी कभी भी कुछ भी अनहोनी कर सकते हैं, इसके लिए उनकी मुस्तैदी जरूरी है। अमेरिका, इजराइल जैसे देशों द्वारा आतंकवाद के सफाए के लिए अपनाए जाने वाली ‘रिवर्स टेरर’ की पद्धति भारतीय सैनिक भी सफलता पूर्वक आजमा रहे हैं।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

सोमवार, 24 जुलाई 2017

मायावती का इस्तीफा यानी अस्तित्व बचाने की कवायद


डॉ. महेश परिमल
खुद को दलितों का नेता बताने वाली मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। हालांकि उनका इस्तीफा अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है। इस्तीफे का कारण उसने यह बताया है कि उन्हें बोलने का अवसर नहीं दिया जा रहा है। भाषण के दौरान भाजपा नेताओं द्वारा खलल डालने का आरोप भी उन्होने लगाया है। वास्तव में ये तो साधारण बातें हैं। इसके पीछे की कहानी कुछ और ही है। मायावती अब समझ गई हैं कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कुछ तो ऐसा करना ही पड़ेगा, जिससे वह कुछ समय के लिए सुर्खियां बटोर सके, ताकि नेतागिरी कुछ समय के लिए चल पड़े।
मायावती का कार्यकाल आगामी अप्रैल में पूर्ण हो रहा है। अब उनके पास केवल 8 महीने का समय ही बाकी है। इस समय उत्तरप्रदेश विधानसभा में बसपा के 19 विधायक ही हैं, लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है। मायावती बहुजन समाज पार्टी की एक ऐसी अध्यक्ष हैं, जो अभी तीन महीने पहले तक उत्तर प्रदेश की राजनीति का पर्याय मानी जाती थीं। अपने आप को वह दलितों का मसीहा कहने से नहीं चूकती। एक समय ऐसा भी था, जब उनका नाम प्रधानमंत्री पद दावेदारों में था। आज उनकी हालत ऐसी हो गई है कि एक राजनीतिक बयान देने में भी उन्हें मशक्कत करनी पड़ रही है। यही उनके इस्तीफे का सही कारण है। वह अच्छी तरह से जानती हैं कि अब राज्यसभा के लिए वह चुनाव नहीं लड़ सकती, यह उनके जीवन का आखिरी कार्यकाल है। लोकसभा या विधानसभा के उपचुनाव में भी वह अपना बल नहीं दिखा पाएंगी। उसके दलित वोट इतने अधिक बिखर गए हैं कि उन्हें अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। इसलिए इस्तीफा देना उनकी मजबूरी है। इससे वह अपने राजनीतिक भूतकाल के खिलाफ अपने वर्तमान की हास्यास्पद स्थिति को रेखांकित कर रहीं है।
जब भी भारतीय राजनीति का इतिहास लिखा जाएगा, तब मायावती का उदय एक चमत्कार के रूप में माना जाएगा। अत्यंत ही साधारण परिवार से आने वाली यह ‘दलित की बेटी’ ही है, परंतु सत्ता में आने के बाद अपने शाही ठाट-बाट, घमंड, अहंकार और अभिमान से भरे संवादों ने उन्हें ‘दौलत की बेटी’ बना दिया। 1993 में जब मायावती का उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रवेश हुआ और वे मुख्यमंत्री बनीं, तब पी.वी.नरसिंह राव ने इसे ‘लोकतंत्र का चमत्कार’ निरुपित किया। राजनीति में खुद को उस्ताद मानने वाली मायावती की पहचान अपने कड़वे बयानों के कारण अधिक है। दलितों को सामने रखकर उसने कई बार ऐसे बयान दिए हैं, जिसे सभ्य समाज स्वीकार नहीं कर सकता। अपने विचारों पर दृढ़ रहने के कारण उनके समर्थक उसे अपना आदर्श मानते हैं। दूसरी ओर अपनी जिद के कारण विरोधी उनसे दूर ही रहते हैं।
दलित वोट बैंक को मजबूत पहचान देने के मामले में कांशीराम और मायावती के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। मुलायम के ओबीसी कार्ड के खिलाफ मायावती ने दलित मतों को अपनी ओर मिला लेने के सफल ध्रुवीकरण के चलते अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती और बसपा को अनदेखा नहीं किया जा सकता। दलित वोट बैंक को तोड़ने की कोशिश में नाकामयाब होने के बाद मुलायम ने मुस्लिम-यादव का नया समीकरण तैयार किया और कामयाब रहे। मुलायम के इस दांव को खारिज करने के लिए मायावती ने दलित और ब्राह्मण को अपने पाले में लाने में सफलता प्राप्त की। जो वर्ग सामाजिक रूप से एक पंगत में बैठता भी नहीं था, मायावती ने उस वर्ग को एक साथ मिला दिया। तब मायावती के सफल, अनोखे और करिश्माई सोशल इंजीनियरिंग की चर्चा हुई थी।
उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में मुलायम के स्थापित वोट बैंक भाजपा की आंधी को रोकने के लिए उसने दलित-मुस्लिम वोटबैंक पर ध्यान केंद्रित किया। साधारण रूप से मुस्लिम वोट बैंक का झुकाव सपा की तरफ माना गया, पर यादव परिवार के बीच जो कलह सामने आया, तब मायावती ने मुस्लिम वोट बैंक पर घुसपैठ करनी शुरू कर दी। इसके लिए उसने 97 मुस्लिमों को टिकट दिया। चुनाव प्रचार के दौरान भी उसने मुस्लिमों की तरफ अधिक ध्यान दिया। दिल्ली के जामा मस्जिद के इमाम को भी अपने पक्ष में कर लिया। मुस्लिमों को रिझाने के लिए उनकी सभाओं में अधिक से अधिक मुस्लिम श्रोताओं को लाने का प्रयास किया गया। मुख्तार अंसारी जैसे कुख्यात अपराधी को भी बिना किसी हिचकिचाहट के उसने पार्टी में ले लिया। उनकी इस तरह की कोशिशों से उनके दलित वोट बैंक उससे दूर जाने लगे। दलित अब मायावती को बेवफा कहने लगे।
बसपा की हालत ऐसी है कि अब मायावती के अलावा दूसरी पंक्ति में कोई नेता नजर ही नहीं आता। स्वामी प्रसाद मौर्य से कुछ आशा थी, पर जब उसने भी मायावती का साथ छोड़कर भाजपा का पल्लू थाम लिया, तो तुनकमिजाज मायावती उन्हें मना नहीं पाई। उल्टे उनके खिलाफ अनाप-शनाप बयान देने लगी। उत्तर प्रदेश की दलित प्रभुत्व वाली 67 सीटों में से 53 सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमा लिया। इस दौरान बसपा की ऐसी फजीहत हुई कि 2012 में 80 सीटों के खिलाफ उस समय यह आंकड़ा केवल 19 तक ही सीमित हो गया। लोकसभा में भी 80 सीटों में से बसपा को एक भी सीट नहीं मिली। इससे उसकी राजनीतिक हैसियत ही खो गई। अब उनके खिलाफ दलितों की नई नेतागिरी उभरने लगी। सहारनपुर के दंगों के बाद चंद्रशेखर नाम के युवा की चर्चा जोरों पर है। उसकी आक्रामकता से लोग प्रभावित हैं। राज्य के दलितों पर वे अपना प्रभाव जमा रहे हैं। पहले मायावती ने एक नारा दिया था-तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार। अब ऐसा ही कुछ चंद्रशेखर कर रहे हैं। सहारनपुर में दलितों की रक्षा करने में मायावती ने देर कर दी। ऐसा चंद्रशेखर बार-बार कह रहे हैं। इस तरह से वे स्वयं को दलितों के मसीहा के रूप में प्रतिस्थापित कर रहे हैं।
मायावती का इस्तीफा अलग बात है, आज तक मायावती ने कोई भी मौखिक भाषण नहीं दिया। जो भी कहा-लिखा हुआ पढ़ा। उनकी अनुपस्थिति से किसी प्रकार की कमी किसी को नहीं खलेगी। पर उत्तर प्रदेश की राजनीति से फिसले पैरों को वह किस तरह से दृढ़ करतीं है, यही देखना बाकी रह गया है।
डॉ. महेश परिमल 

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

सीमा विवाद और भारत-चीन के रिश्ते




                                http://epaper.jagran.com/epaper/13-jul-2017-262-National-Page-1.html
                                       आज दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित मेरा आलेख

शनिवार, 8 जुलाई 2017

रंग बदलने में गिरगिट को भी पीछे छोड़ देते हैं नीतिश कुमार

डॉ. महेश परिमल
राजनीति में रंग बदलना बहुत ही आसान है, पर इतना आसान भी नहीं कि गिरगिट भी शरमा जाए। राजनीति में सफल होने के लिए नेता रंग बदलते ही रहते हैं। पर कब कहां किस तरह से गुलाटी मारनी है या रंग बदलना है, यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसमें जरा-सी भी चूक राजनीति से बाहर कर सकती है। पर बिहार की राजनीति करते हुए मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने एक गुलाटी से कई निशाने साधे हैं। राष्ट्रपति पद के लिए भाजपा ने जब रामनाथ कोविंद को समर्थन देने की घोषणा करते हुए नीतिश कुमार ने एक पत्थर से कई निशाने साधे हैं। इससे विपक्ष जो अब तक मौन साधे हुए अपनी एकता की शान बघार रहा था, अब बिखरता नजर आ रहा है। नीतिश ने कोविंद को समर्थन की घोषणा करते हुए जो निशाने साधे हैं, उससे विपक्ष का समीकरण बिगड़ता दिखाई दे रहा है।
भाजपा के प्रत्याशी को समर्थन देने की घोषणा कर नीतिश ने तीन संकेत दिए हैं। पहला संदेश लालू प्रसाद यादव को जाता है कि उसका परिवार भ्रष्टाचार से बाज आए। इसी कारण से वे जब चाहें, उनसे नाता तोड़ सकते हैं। दूसरी तरफ उन्होंने भाजपा की नेतागिरी का संकेत दिया है कि बिहार में वे भाजपा से गठबंधन कर सरकार बना सकते हैं। तीसरी तरफ उन्होंने विपक्ष को यह संकेत दिया है कि यदि उन्हें 2019 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं बताया, तो वे भाजपा का पल्लू पकड़ सकते हैं। अपनी 5 दशक की राजनीतिक यात्रा में नीतिश कुमार ने कई बार सोच-समझकर गुलाटी मारी है। इससे उन्हें काफी राजनीतिक लाभ भी मिला है। विचारधारा की दृष्टि से वे समाजवादी हैं। लालू यादव की तरह वे भी राम मनोहर लोहिया के शिष्य हैं। ‘70 के दशक में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के भ्रष्ट शासन के खिलाफ नवनिर्माण का आंदोलन शुरू किया था, उसमें नीतिश कुमार और लालू यादव कंधे से कंधा मिलाकर साथ-साथ थे। 1989 में वी.पी.सिंह के जनता दल ने राजीव गांधी को हराया, उसमें भी नीतिश कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जनता दल का विभाजन हुआ, तब वे लालू यादव, शरद यादव और रामविलास पासवान के साथ थे। उस समय नीतिश कुमार का राजनीतिक भविष्य डांवाडोल हो रहा था। तब उन्होंने जार्ज फर्नाण्डीस के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई। 1998 में जब केंद्र में भाजपा के मोर्चे की सरकार आई, तब उन्होंने वामपंथी विचारधारा को दरकिनार करते हुए एनडीए सरकार में शामिल हो गए। पहले तो वे रेल मंत्री बने, फिर कृषि मंत्री बने, उसके बाद 2001 से लेकर 2004 तक वे एक बार फिर रेल मंत्री पद को सुशोभित करने लगे।
सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में एनडीए की हार से नीतिश कुमार का राजनीतिक भविष्य एक बार फिर हिचकोले खाने लगा। 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव होने वाले थे। उस समय लोग लालू यादव और राबड़ी देवी के जंगलराज से त्रस्त हो चुके थे। इस जंगलराज से मुक्ति दिलाने के नारे के साथ उन्होंने भाजपा से नाता जोड़ लिया। उनका ये पैंतरा काम आया, भाजपा से गठबंधन कर वे मुख्यमंत्री बन गए। अपने 5 साल के कार्यकाल में नीतिश कुमार बिहार को विकास के रास्ते पर ले आए। भाजपा के साथ मिलकर नीतिश ने बिहार को भ्रष्टाचारमुक्त प्रदेश दिया। इसी कारण वे 2005 का चुनाव जीत गए।
2002 में जब गुजरात में दंग हुए थे, तब नीतिश कुमार केंद्र में भाजपा मोर्चे की सरकार के रेल मंत्री थे। उधर नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। गुजरात दंगों के विरोध में होने के बाद भी नीतिश कुमार ने रेल मंत्री का पद नहीं छोड़ा था। पर जब 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया, तो वे उनके विरोध में उन्होंने बिहार में भाजपा से अपना गठबंधन तोड़ लिया। नीतिश कुमार की इस गुलाटी से उनकी सरकार खतरे में पड़ गई। तब 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में  बिहार में जेडी(यू) से उनके मतभेद हो गए। इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा देकर एक बार फिर गुलाटी मारी। नीतिश कुमार के इस्तीफे से जीतेन राम मांझी बिहार के मुख्यमंत्री बन गए।
नीतिश कुमार यह अच्छी तरह से जानते थे कि बिहार में वे अपने दम पर अकेले चुनाव नहीं जीत सकते। हालत यह थी कि भाजपा से गठबंधन कर नहीं सकते थे। लालू से भी उनकी पटरी नहीं बैठ पा रही थी। 2014 में जब बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजा, तो उन्हें भाजपा को दूर रखने का बहाना मिल गया। न चाहते हुए भी उन्होंने अपने कट्टर दुश्मन लालू यादव से हाथ मिला लिया। इन दिनों नीतिश कुमार को अचानक ही याद आया कि वे और लालू यादव दोनों एक ही गुरु यानी राम मनोहर लोहिया के शिष्य हैं। लालू के अलावा उन्होंने कांग्रेस के साथ भी सीटों का बंटवारा किया। भाजपा के विरोध में एक कथित रूप से महागठबंधन बना। इससे नरेंद्र मोदी की आंधी के बाद भी बिहार के विधानसभा चुनाव में भाजपा हार गई। नीतिश कुमार एक बार फिर अपनी पैंतरेबाजी से जीत गए।
बिहार में नीतिश कुमार का भाजपाविरोधी महागठबंधन सफल रहा। इसके बाद जब 2019 के लोकसभा चुनाव की बातें होने लगी, तो इस महागठबंधन में प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम भी शामिल किया गया। इसके पीछे यही वजह मानी जाती है कि इतनी गुलाटी मारने के बाद भी विपक्ष में उनकी छवि स्वच्छ मानी जाती है। इस दौरान लालू यादव के परिवार का भ्रष्टाचार सामने आने लगा, तो नीतिश डर गए। अब यदि लालू यादव के परिवार पर किसी तरह की कार्रवाई होती है, तो उसके छींटे उन पर भी पड़ेंगे ही। इसलिए उन्होंने बड़ी चालाकी से भाजपा की तरफ सरकने की योजना बनाई। भाजपा के प्रत्याशी को अपना समर्थन देकर वे एक तीर से कई निशाने साध रहे हैं, पर वे शायद यह भूल रहे हैं कि भाजपा में अभी प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली नहीं है।
डॉ. महेश परिमल


शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

मुृम्बई महिला पुलिस की हैवानियत का एक और नमूना

                                                लोकोत्तर भोपाल में 5 जुलाई 2017 को प्रकाशित आलेख




सोमवार, 5 जून 2017

5 जून विश्व पर्यावरण दिवस - कविता - उदास नदी

5 जून विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर स्व. अनुपम मिश्र जी की स्मृति में…. कविता - उदास नदी… नदी उदास है और खामोश भी। उसका मसीहा उससे बहुत दूर चला गया है। इतनी दूर कि लौटकर नहीं आ सकता और इसीलिए नदी उदास है। दूर कहीं आसमान से, मसीहा भी निहार रहा है उदास नदी को… पर वह विवश है, नहीं छीन सकता उसकी उदासी, नहीं तोड़ सकता उसकी खामोशी, जीवन भर स्वयं को, जल यज्ञ में होम करता रहा, कि नदी खिलखलाती रहे, इठलाती रहे, बलखाती रहे… और एकाएक शून्य में समा गया वो। अपने सारे सपने तट पर ही छोड़ गया वो। रोज एकांत में खाली आँखों से निहारता है नदी को और नदी देखती है उसे उन्हीं रिक्त लहरों से… मगर एक दिन, मसीहा को दिखे कुछ युवा नदी के मुहाने पर उसकी उम्मीद जाग उठी वे युवा किसी गंभीर विषय पर चर्चा कर रहे थे। आज के समय में प्रदूषण से बढ़कर गंभीर विषय और क्या हो सकता है? लेकिन उनकी चर्चा सुनकर उम्मीद टूटती गई क्योंकि केवल चर्चा करना समय बिताने का साधन ही तो है! क्या करेंगे ये? क्या कर पाएँगे ये? सोच ही रहा था वह मसीहा कि वहीं पर कुछ नन्हे मासूम खेलते नजर आए वो उन्हें देख ही रहा था कि एक मासूम उन युवाओं के पास आया एक युवा जब सिगरेट की राख नदी में बार-बार डाल रहा था कि मासूम ने कहा – भैया, ऐसा न करो। इससे पानी गंदा हो जाएगा। और फिर उसने अपनी नन्हीं हथेली में वह राख तैरता पानी भर लिया और उसे धरती पर उड़ेल दिया। मुस्कराता हुआ फिर दूसरे मासूमों से जा मिला। जब मसीहा ने देखा मासूम की इस हरकत को उसकी उम्मीद यकींन में बदल गई कोई तो है जो उसके अधूरे काम को पूरा करेगा उसका स्वप्न साकार करेगा सुकून की साँसे लेकर करवट बदल ली उसने और उसके चेहरे पर सुकून देखकर कई दिनों से उदास नदी हौले से मुस्करा दी। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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